डाक्टर vs प्रेत

दोस्तोँ एक अन्य अनुभव शेयर कर रहा हूँ जो कि पश्चिमी चिकित्सा और पारलौकिक विज्ञान के बीच का युद्ध है। आपको शायद पढ़ने मेँ ये किसी फिल्म की कहानी लगे परंतु ये अक्षरशः सत्य है क्योँकि मेरे पिताजी, ताऊ ताईजी और उनके अनेको पड़ोसी इसके प्रत्यक्षदर्शी हैँ। बात सन 1977 के करीब की है मेरे एक चचेरे ताऊ जो कानपुर मेँ ही शहर के दूसरे हिस्से मेँ रहते थे, के बगल वाले मकान मेँ उस इलाके के एक प्रतिष्ठित डॉ रहते थे जो लंदन से एमडी करके आए थे। दोनो परिवारोँ मेँ काफी करीबी संबंध थे इसलिए मेरे पिताजी की भी डॉ साहब से अच्छी दोस्ती थी और एक दो बार मेरे पिताजी ने भी ये घटना देखी। परिवार डॉ साहब की पत्नी, माँ, एक बेटी और बड़ा भाई, भाभी और उनके बच्चे थे। बेटी करीब 14 साल की और बहुत सुंदर थी। 
एक दिन स्कूल से घर आने के बाद उसकी तबियत कुछ बिगड़ गयी, घर वालोँ ने फोन किया तो डॉ साहब ने दवा बता दी, कुछ आराम मिला, क्लीनिक से लौटकर उन्होँने यथोचित इलाज किया और करते रहे। उनके इलाज से आराम तो था पर रोग बना रहा धीरे धीरे बेटी ने स्कूल जाना बंद कर दिया और बिस्तर पर पड़े पड़े कभी हँसती कभी अजीब अजीब चेहरे बनाती तो कभी आवाजेँ निकालती, आदमियोँ जैसी भी। डॉ साहब दवा खिलाते और इंजेक्शन लगाते रहे। इसी तरह कई दिन बीत गये। लड़की का रंग काला पड़ने लगा, शरीर सूखने लगा तो लक्षण देख बड़े बुजुर्गोँ और पड़ोसियोँ ने झाड़ फूँक कराने की सलाह दी। पत्नी, भाभी और माँ ने जब ये बात उनके सामने रखी तो वे बरस पड़े और सबको अँधविश्वासी तथा गँवार बता दिया। यदि कभी अन्य किसी ने उनकी मौजूदगी मेँ ये सलाह देदी तो लंदन मेँ पढ़े लिखे डॉ साहब उसे भी बुरी तरह डाँट देते। सारे टेस्ट करवा चुके थे बड़े शहरोँ के डॉक्टरोँ से मश्विरा कर इलाज कर रहे थे पर बेटी की हालत जस की तस। उनके सामने तो कुछ नहीँ हो सकता था इसलिए उनके क्लीनिक जाने के बाद परिवार ने एक झाड़ फूँक वाले को बुलवाया, परंतु लड़की की हालत देख उसने हाथ खड़े कर दिये और अपने गुरू जो बहुत मशहूर ताँत्रिक था, से सम्पर्क करने को कहा और कहा कि इसे बाँध दो और कमरे मेँ बंद कर दो वरना ये अपनी जान ले सकती है, एक दो बार उसने ऐसी कोशिश करी तो घरवालोँ ने उसे बाँध दिया। डॉ साहब की गैरमौजूदगी मेँ उसके गुरु को भी बुलाया गया, गुरू ने कुछ तंत्र क्रियाएँ कर जल सिद्ध किया और उसके छीँटे मारे तो जैसे तूफान आ गया। 
लड़की जोरोँ से पुरूष की आवाज मेँ चीखने लगी, गुरु ने कुछ मँत्र पढ़े और छीँटे मारे तो फिर वो हँसने लगी और बोली "तू जानता नहीँ मैँ कौन हूँ तेरे जैसे तांत्रिकोँ को तो चुटकी मेँ उड़ा दूँगा।" बिस्तर पर बँधे हुए ही उसने अचानक उछल कर ताँत्रिक को चाँटा मारने की कोशिश की, बो किसी तरह बच तो गया पर लड़की की दो अँगुलियाँ उसकी छाती से छू गयी और वो कई फुट पीछे जा गिरा। लोगोँ की मदद से जैसे तैसे उठा उसकी छाती पर ऐसे निशान बन गये थे जैसे किसी ने बेँत से पीटा हो। हिम्मत जुटाकर उसने लड़की को शाँत करने और पुनः रूग्ण रूप मेँ लाने की कोशिश की पर असफल रहा क्योँकि लड़की के अंदर मौजूद शैतान बहुत ताकतवर था और जाग चुका था। अंततः गुरू ने घरवालोँ से माफी माँगी और किसी अन्य से इलाज कराने को कहा। शाम को डॉ साहब घर आये और सब जान कर उनका पारा सातवेँ आसमान पर पहुँच गया। घर वालोँ को बहुत भला बुरा कहा और बोले की बीमारी का असर दिमाग पर हो गया है। इस बीच कई सिद्ध तांत्रिक आये पर कुछ न कर सके उनमेँ ही किसी ने बनारस के एक बड़े तांत्रिक का पता दिया। घरवालोँ ने उसे बुलवाया और पास ही एक होटल मेँ रूकने का प्रबँध किया।डॉ साहब के जाने के बाद वो आया और काम शुरू किया, घर बाँधा, दिशा बाँधी मौजूद लोगोँ को सुरक्षित कर क्रिया शुरु की तो लड़की बेचैन हो उठी, जल के छीँटे दिये और अपनी शक्ति से लड़की या कहेँ कि शैतान को मजबूर कर प्रश्न पूछे तब उसने बताया कि "मैँ एक प्रेत हूँ , स्कूल से लौटते वक्त इसने एक चौराहे को पार किया जहाँ किसी ने मुझे कुछ सामग्री मेँ उतार कर रखा था, ये उस सामग्री पर पैर रखते हुए आई और वहाँ पड़े गुलाब के फूल को उठा लाई तब मैँ इस पर सवार हो गया"। लड़की को छोड़ने की बात कहने पर बोला "ये बहुत सुँदर है इसे नहीँ छोड़ूँगा और मैँ इसे साथ ले कर ही जाऊँगा"। ताँत्रिक ने और अधिक मंत्र पढ़े तो लड़की बेहोश हो गयी। उसने वादा किया कि 5 दिनोँ मेँ लड़की प्रेत से मुक्त हो पहले जैसी हो जाएगी। अगले दिन फिर यही कार्यक्रम चला पर प्रेत भी बड़ा ढीठ था, नहीँ माना और लड़की ले जाने की बात कहता रहा। 
तीसरे दिन ये चल ही रहा था कि किसी ने डॉ साहब को खबर कर दी और वे अचानक धमक पड़े। ताँत्रिक को देख बहुत लाल पीले हुए और उसका बहुत अपमान किया। ताँत्रिक ने समझाने की बहुत कोशिश की पर वे नहीँ माने और दिमागी पीड़ा बताते रहे और ताँत्रिक पर बँदूक तान दी। प्रेत से जीत रहा ताँत्रिक डॉ से हार कर चला गया और बोला "बहुत पछताओगे, बेटी खो दोगे"। प्रेत हँस रहा था, डॉ साहब ने लड़की को सुलाने के लिए इंजेक्शन लगाया तो प्रेत बोला "डॉ. अब तेरी कोई दवा असर नहीँ करेगी तूने आखिरी मौका खो दिया। आने वाली अमावस को सुबह साढ़े दस बजे मैँ तेरी बेटी को ले जाऊँगा"। घर के लोगोँ ने ताँत्रिक को बुलाना चाहा पर जिद्दी डॉ के आगे किसी की न चली। अमावस नजदीक आती जा रही थी डॉ साहब ने दिल्ली आगरा तक के बड़े बड़े 10-12 विशेषज्ञ बुलवा लिए पर कुछ काम न आया। प्रेत के बताए अनुसार अमावस के दिन ठीक साढ़े दस बजे प्रेत ने जोर का ठहाका लगाया और बोला अब "मैँ जा रहा हूँ तेरी बेटी को लेकर, आखिरी बार देख ले" फिर बेटी निढाल हो गयी। 10- 12 डाक्टरोँ, परिवार और करीबी पड़ोसियोँ से भरे कमरे मेँ बिस्तर पर उसका शरीर पड़ा था, और प्रेत बेटी को ले जा चुका था।

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