सम्भोग से समाधि: पूर्ण विज्ञान


ओशो ने इस पतित देश को ७० के दशक में ही भारत के शाश्वत विज्ञान तंत्र से परिचित कराने का दुर्घर्ष प्रयास किया था और अपनी प्रतिष्ठा और जीवन की परवाह नही करते हुए खालिस सत्य का उदघाटन किया . पर इस देश की पतित मेधा ने उसे मूल्य देना तो दूर विवाद का विषय बना कर उस मसीहा के साथ जघन्य दुर्व्यवहार किये. आज उनके पोंगे पंडित यूँ दुराचार के आरोपों में जेल की हवा खा रहे हैं तो बड़े-बड़े साधू लोग सेक्स स्कैंडल के पात्र हैं. देश में सच्चे ब्रह्मचर्य के उद्भूत होने की संभावनाओ को तार-तार करते ये यौन कुंठित धर्म के ठेकेदार इन बिन्दुओ पर यदि पुनः विचार करें तो संभव है की सच्चे ब्रह्मचर्य का आस्वादन कर सकें.
_______________________
सम्भोग और समाधि एक ही ऊर्जा के भिन्न तल हैं. निम्न तल यानी मूलाधार चक्र पर जब जीवन ऊर्जा की अभिव्यक्ति होती है तो यह सेक्स बन जाता है. उच्च तल पर समान उर्जा भगवत्ता बन जाती है जिसे समाधि कहा गया है.
___________________________
यौन ऊर्जा का अर्थ वीर्य से नही है. वीर्य मात्र यौन ऊर्जा का भौतिक तल है. यौन ऊर्जा का वाहक है वीर्य. यौन ऊर्जा ऊपर गति करती है इसका यह अर्थ नही है वीर्य ऊपर चढ़ जाता है. वीर्य के ऊपर चढने का कोई उपाय नही है. यह मनस ऊर्जा है और अदृश्य है. इसका केवल अनुभव होता है. जैसे हवा अदृश्य है और उसका केवल अनुभव होता है.
_________________________________-
हमारी रीढ़ की हड्डी में ३ सूक्ष्म नाड़िया हैं - इडा- पिंगला- सुषुम्ना. यह मनस उर्जा सुषुम्ना के द्वारा ऊपर का अभियान करती है. इसका सामना सात स्टेशनों से पड़ता है जिसे चक्र कहते हैं. और इस पूरी ऊर्जा की यात्रा को 'कुण्डलिनी जागरण' कहते हैं.
___________________________
ध्यान की और तंत्र की ११२ विधियाँ हैं जिनके द्वारा इस ऊर्जा को ऊपर ले जाया जा सकता है. ओशो की समस्त ध्यान विधियाँ यहीं हैं.
_________________________________
यह विधिया आज से हजारों वर्ष पूर्व विश्व के प्रथम बुद्ध पुरुष भगवान शिव ने पार्वती को कहीं थी जिसे ' विज्ञान भैरव तन्त्र' में संस्कृत में संकलित किया गया है. ओशो ने इसपर तन्त्र सूत्र नामक प्रवचन माला पर अद्भुत प्रवचन दिए हैं.
______________________________-
प्रत्येक चक्र से शरीर जुडा हुआ है. और हर दूसरा शरीर विपरीत है. अर्थात पुरुष का दुसरा शरीर स्त्री का है और स्त्री का दुसरा शरीर पुरुष का. इसी लिए स्त्रियाँ पुरुषों से अधिक धैर्यवान होती हैं क्यूँ की उनका दूसरा शरीर पुरुष का है जो अपेक्षाकृत मजबूत है.
अर्धनारीश्वर की प्रतिमा यही सन्देश देती है .
__________________________
इस प्रकार प्रत्येक शरीर में ७ चक्रों से जुड़े ७ शरीर होते हैं. एक -एक चक्र के जागरण के साथ एक एक शरीर सक्रीय होने लगता है.
_________________________-
शरीर परस्पर मिल जाते हैं. कुंडली जागरण की यह प्रक्रिया ' अंतर सम्भोग' कही जाती है क्यूँ की एक स्त्री शरीर अपने ही पुरुष शरीर से संयुक्त हो जाती है, इसमें ऊर्जा नष्ट नही होती बल्कि ऊर्जा का एक अनन्य वर्तुल बन जाता है जो आध्यात्मिक जागरण और आंतरिक आनंद के रूप में परिलक्षित होता है. संतो के चेहरे पर खुमारी, तेज, दिव्यता का यही कारण है.
___________________________________
इस अंतर सम्भोग के अनेक दिव्य परिणाम होते हैं- बाहर के सेक्स से अनंत गुना आनंद और तृप्ति उपलब्ध होती है. प्रत्येक चक्र के जागरण और शरीरो के मिलन से आनंद का खजाना मिलने लगता है. बाहर सेक्स की इच्छा समाप्त हो जाती है. इसी को ब्रह्मचर्य कहते हैं. व्यक्ति ब्रह्म जैसा हो जाता है. उसकी चर्या ब्रह्म जैसी हो जाती है. शिव लिंग का प्रतीक इसी अंतर सम्भोग को परिलाक्ष्यित करता है.
__________________________
चक्रों के जगने के साथ उसके सम्बंधित सिद्धियाँ मिल जाती हैं- जैसे ह्रदय चक्र के जगने के साथ विराट करुना व प्रेम के आनंद का भान होने लगता है. आज्ञा चक्र के जगने के साथ व्यक्ति तीनो कालो को जानने वाला हो जाता है. विशुद्दी चक्र के जागने के साथ व्यक्ति जो बोले वह सत्य होने लगता है. प्राचीन आशीर्वाद की कथाये उन्ही ऋषियों की क्षमताये हैं जिनका विशुद्धि चक्र सक्रीय हो गया था.
_____________________________________
सहस्रार चक्र आखिरी चक्र है जिसके सक्रीय होते ही व्यक्ति परम धन्यता को उपलब्ध हो जाता है जब वह ब्रह्म ही हो जाता है- 'अहम् ब्रह्मास्मि' का उद्घोष . उसके शक्ति के अंतर्गत समस्त सृष्टि की शक्तियां उसके पास आ जाती हैं लेकिन वह इनका उपयोग नही करता क्यूँ की उसे यह भी बोध हो जाता है की सृष्टि व इसके नियम उसी के द्वारा बनाये गये हैं.
__________________________________________
परम ज्ञान की अवस्था को समाधि कहा गया है. समाधि का अर्थ है समाधान. इसकी प्रतिभिज्ञा चौथे शरीर से ही होने लगती है. चौथे शरीर से ही परमात्मा का ओमकार स्वरूप पकड़ में आने लगता है. सद्गुरु दीक्षा में ओमकार या अनाहत नाद का एक धागा पकड़ा देते हैं जिसे पकड़ कर साधक अंतिम कुण्डलिनी जागरण तह आसानी से चला जाता है. जो गुरु यह करने में सक्षम है उसे ही पूरा गुरु कहा जाता है. इस योग को सहज या विहंगम योग कहते हैं. मन्त्र दान का अर्थ है 'गुरु द्वारा ॐ का अनुभव करा देना' जो गुरु मन्त्र जाप करने को कहता है वह गुरु नही है- धंधा कर रहा है आध्यात्म के नाम पर.
_______________________________________
परम आनंद, परम दिव्यता,बुद्धत्व, कैवल्य, जिनत्व , परम धन्यता, ब्रह्मचर्य आदि शब्द एक ही हैं और उपलब्ध होते हैं यौन ऊर्जा को सही और वैज्ञानिक दिशा देने से. न की काम का दमन करने से. ओशो जीवन पर्यंत यही देशना गली-गली देते रहे पर इस देश की कुंठित मानसिता ने उनके गहनता को न समझा और मात्र उस मसीहा पर आक्षेप किये. उनकी पुस्तक सम्भोग से समाधि की और में यही विज्ञान पूरा वर्णित है.
____________________________________
मेरी यही कामना है की यौन ऊर्जा का सदुपयोग करते हुए क्यूँ न हाँ ब्रह्म का अभियान करे? क्यूँ इसके दास बन कर जियें.? क्यूँ एक निस्तेज जीवन जियें? क्यूँ न एक पूरा गुरु के शरण में जा कर जीवन में ब्रह्मचर्य पैदा करें.?

कोई टिप्पणी नहीं: