Narayan Kavach | नारायण कवच


ॐ श्री विष्णवे नमः (3 बार)
ॐ नमो नारायणाय (३ बार)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (३ बार)
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ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताड़् घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापपाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१।।
भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे ही ॐकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से मेरी रक्षा करें।।१।।

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।२।।
मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें ।।२।।
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।३।।
जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर गये थे, वे दैत्ययूथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें ।।३।।

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।।४।।
अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ।।४।।

मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।५।।
भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से मेरी रक्षा करें ।।५।।

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।६।।
परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ।।६।।

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।७।।
भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान् ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें ।।७।।

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कलेः कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।८।।
भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।८।।

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसंगवमात्तवेणुः ।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।९।।
प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।९।।

देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।१०।।
तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।१०।।

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।११।।
रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।११।।

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमा
शु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।१२।।
सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये ) की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ।।१२।।
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।१३।।

कौमुद की गदा ! आपसे छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दीजिये ।।१३।।
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।१४।।

शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।१४।।

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चक्षूंषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ।।१५।।
भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दीजिये। भगवान् की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर दीजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।१५।।

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।१६।।

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।१
७।।
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायें ।।१६-१७।।

गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।१८।।
बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।१८।।

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धीन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।१९।।
श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।१९।।

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ।।२०।।
जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।२०।।

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।२१।।
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।२२।।
जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ।।२१-२२।।

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।२३।।
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें ।।२३।।

Darud Sharif & Ayutul Kursi


दरूद शरीफ 

 | अल्लाह हुम्मा सल्ली अला मुहम्म्दिव व् अला आले मुहमद्दीन कमा सल्लयता अला इब्राहीमा व् अला आले इब्राहीमा इन्नका हमीदुम्म्जिद अल्लाह हुम्मा बरिक अला मुहम्म्दिव व् अला आले मुहम्मदीन कमा बर्कता अला इब्राहीमा इन्नका हमीदुम्म्जिद |

कोई भी परेशानी सामने हो तो सच्चे मन से दरूद शरीफ पढनेके बाद परेशानी ख़तम हो जाती है।  एकबार दरूद शरीफ पढनेसे इन्सान की दस बुराइया खुदा माफ़ कर देते है। सदैव पढने वाले पर अल्लाह की मेहरबानी होती है 

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आयुतुल कुर्सी 

| अल्लाहु ला इला - हा इल्ला हुवल हय्युल कय्युमु ला ताखुजुहू सी-न-तुवं-व्-ला- नौम लहू माँ फिस्स्मावाती व् मा फिल अर्जी मन जल्लजि यश्फवु इनदहू इल्ला बिह्ज्निही यअलमु मा बै-न ऐ दिहीम व् मा खल-फ हुम् व् ला युहितु-ना बिशैम मिन इल्मिही इल्ला बिमा शा-आ व् सि-आ कुर्सी युहुस्स्मावाती वल अर्ज व् ला यऊदुहु हिफ्ज़ हुमा व् हुवल अलियुल अजीम |

जो भी व्यक्ति नमाज के बाद अयुतुल कुर्सी पढ़ेगा वो जन्नत में जायेगा।  रात्रि को सोते समय इसे पढ़े तो समस्त बलाओं से उसकी सुरक्षा होगी । असर की नमाज के बाद एकांत स्थान में पढनेसे समस्त इछाये पूर्ण होंगी |
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Das Mahavidya | दस महाविद्या

दस महाविद्या की साधना उपासना जप मंत्र आदि की जानकारी:

इस धरती पर ऐसे कितने ही लोग है जिन्होने शक्ति की उपासना करी होगी। शक्ति के विभन्न रुप है जैसे दुर्गा काली आदि । सच मे तो सभी देवीयाँ एक ही है अंतर है तो मुड और चित्रण का। मानो आद्याशक्ति कोध्र मे है तो काली और कोध्र मे तो तारा और अगर और ज्यादा कोध्र मे है तो धूमवती आदि आदि होती है। इस प्रकार दयाभाव के भी विभिन्न स्वरुप है, जैसे प्रेम और पोषण करते समय भुवनेश्वरी, मतंगी और महालक्ष्मी कहलाती है।

इसी प्रकार से शक्ति साधना में दस महाविद्याओं की उपासना होती है। यह सब महाविद्या ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के लिए करी जाती हैं। आईए क्रम से इनका विवरण करता हूँ :-

1. काली 

2. तारा 
3. त्रिपुरसुंदरी 
4. भुवनेश्वरी 
5. त्रिपुर भैरवी 
6. धूमावती 
7. छिन्नमस्ता 
8. बगला 
9. मातंगी 
10. कमला

इसमे भी दो कुल है, काली कुल और श्री कुल। चार काली कुल की साधना है और छः श्री कुल की साधना है। महाविद्या साधना करने के लिए किसी व्यक्ति का ब्रह्मण होना अनिवार्य नही। महाविद्या की साधना कोई भी कर सकता है। इसमे जाति, वर्ग, लिंग आदि का कोई भेद नही है और सभी प्रकार के बन्धन से मुक्त है। सभी महाविद्या मे भैरव की उपासना भी कर लेनी चाहिए। क्योकि यह महाविद्याए है तो इनकी क्रिया भी थोडी सी जटिल तो होगी ही इसलिए इनकी साधना शुरु करने से पहले आपको पंच शुद्धियों करनी ही चाहिए है।

स्थान शुद्धि, देह शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, देव शुद्धि और मंत्र शुद्धि

किसी योग्य गुरु से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए। दीक्षा शब्द का अर्थ मात्र यही होता है कि “एक व्यक्ति ने सीखया और दूसरे ने सही से सीख लिया” हो तो इसे दीक्षा कह जाता है। एक दिन मे ना जाने कितनी दीक्षाए हम सब के बीच मे समप्न्न होती रहती है। यदि इससे भी ज्यादा कोई गुरु कृपा करे तो वह गुरु अपनी की गई साधना का कुछ अंश अपने शिष्य मे डाल देता है।

दीक्षा भी ठीक ऐसे ही होती है जैसे किसी ने, अपनी मेहनत से कमाई सम्पति को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम कर दिया। अब यह बात अलग है कि कितने प्रतिशत। गुरु दीक्षा के दौरान सभी क्रिया को समझाते है। यह किसी भी माध्यम से किया जा सकता है। किसी भी साधना की मुद्राएँ न्यास, यंत्र पुजन, माला पुजन, प्राण प्रतिष्ठा, पंचोपचार आदि की जानकारी गुरु करवाते है। साथ ही वो विधि प्रदान करते है जिससे साधना होगी और अवश्यकता होने पर यंत्र, माला भी आदि प्रदान करते है। केवल शरीर के त्याग के समय ही कोई गुरु अपनी सारी शक्ति को किसी शिष्य को दे सकता है। साधक स्वयं को श्री गुरु के चरणों में समर्पित कर अनवरत शक्ति-साधन हेतु यजन-पूजन धारा में बह चले तो फिर कुछ भी असंभव नहीं रहता है।
पहले स्वयं की देह को शोधन किया जाता है और मंत्रो के द्वारा स्नान करता है।
पूजन स्थान का शोधन भी करना चाहिए है।
देह का शोधन करने हेतु आसन पर आसीन होकर प्राणायाम तथा भूत शुद्धि की क्रिया से अपने शरीर का शोधन करना चाहिए।
ईष्ट देवता की शरीर मे प्रतिष्ठा कर नाना प्रकार के न्यास इत्यादि कर अपने शरीर को देव-भाव से अभिभूत कर अपने ईष्ट देवता का अन्तर्यजन करता है। शास्त्रो मे इसलिए कहा जाता है कि 'देवम्भूत्वा देवम्‌ यजेत' अर्थात्‌ देवता बनकर ही देवता कर ही किया जाता है। ईष्ट देवता बहिर्याग पूजन का मतलब यह है कि अन्दर तो देवता स्थापित है ही परंतु उसको बाहर लाकर बाहर भी पुजा करी जाती है। जैसे यंत्र आदि मे स्थापित देवता की पुजा करना। आह्वान कर मंत्र द्वारा संस्कार करना चाहिए इसके पश्चात पंचोपचार, षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों के द्वारा महाविद्या यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन कर, उसमें स्थापित देवता की ही अनुमति प्राप्त कर पुजन करना चाहिए। फिर अंतिम समय मे तर्पण करके, हवन वेदी को देवता मानकर अग्नि रूप में पूजन कर विभिन्न प्रकार के बल्कि द्रव्यों को भेंट कर उसे पूर्ण रूप से संतुष्ट करता है। इसके बाद देवता की आरती कर पुष्पांजलि प्रदान करता है। इसके कवच-सहस्रनामं स्त्रोत्र आदि का पाठ करके स्वयं को देवता के चरणों में आत्मसमर्पित करता है। पश्चात देवता के विसर्जन की भावना कर देवता को स्वयं के हृदयकमल में प्रतिष्ठित कर लेता है और शेष सामग्रीयो को किसी जल मे प्रवाहित कर दे।
आईए अब बात करते है क्रमवार ही सभी दसमहाविद्या के मंत्रो की और इनके प्रभाव की। कम से कम किसी भी महाविद्या मे न्यास और कुछ मुद्राओ का ज्ञान और चैतन्य यंत्र और माला की अवश्यकता रहती है। किसी ऋर्षि ने मंत्र को कहा, बीज, शक्ति, कीलकं, देवता और क्यो पुजन किया जा रहा है वो कारण भी पता होना चाहिए।

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काली

देवी कालिका काम रुपणि है इनकी कम से कम 9,11,21 माला का जप काले हकीक की माला से किया जाना चाहिए। इनकी साधना को बीमारी नाश, दुष्ट आत्मा दुष्ट ग्रह से बचने के लिए, अकाल मृत्यु के भय से बचने के लिए, वाक सिद्धि के लिए, कवित्व के लिए किया जाता है। षटकर्म तो हर महाविद्या की देवी कर सकती है। षट कर्म मे मारण मोहन वशीकरण सम्मोहन उच्चाटन विदष्ण आदि आते है।

परन्तु बुरे कार्य का अंजाम बुरा ही होता है। बुरे कार्य का परिणाम या तो समाज देता है या प्रकृति या प्रराब्ध या कानून देता ही है। इसलिए अपनी शक्ति से शुभ कार्य करने चाहिए।

मंत्र “ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहाः”

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तारा

तारा को तारिणी भी कहा गया है। जिस पर देवी तारा की कृपा हो जाये उसे भला और क्या चाहिए। फिर तो वो साधका एक दूध पीते बच्चे की तरह माँ की गोद मे रहता है। इनकी साधना से वाक सिद्धि तो अतिशीघ्र प्राप्त होती है साथ ही साथ तीब्र बुद्धि रचनात्मकता डाक्टर इनजियर बनाने के लिए, काव्य गुण के लिए, शत्रु को तो जड से खत्म कर देती है। इसके लिए आपको लाल मूगाँ या स्फाटिक या काला हकीक की माला का इस्तेमाल कर सकते है। मेरे हिसाब से कम से कम बारह माला का जप किया जाना चाहिए। कृपा करके इस देवी के मंत्रो मे स्त्रीं बीज का ही प्रयोग करे क्योकि त्रीं एक ऋषि द्वारा शापित है। इस शाप का निदान केवल त्रीं को स्त्रीं बनाने पर स्वयँ हो जाता है।

मंत्र “ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट”

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त्रिपुर सुंदरी

इस दुनिया मे ऐसा कोई काम नही है जिसे त्रिपुर सुन्दरी ना कर सके। जिस काम मे देवता का चयन करने मे कोई दिक्कत हो तो देवी त्रिपुर सुन्दरी की उपासना कर सकते है। यह भोग (सेक्स वअन्य) और मोक्ष दोनो ही साथ-साथ प्रदान करती है। ऐसी इस दुनिया मे कोई साधना नही है जो भोग और मोक्ष एक साथ प्रदान करे। इस मंत्र के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला का इस्तेमाल किया जा सकता है। कम से कम दस माला जप करें।

मंत्र – “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः

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भुवनेश्वरी

यह साधना हर प्रकार के सुख मे वृद्धि करने वाली है। देवी भुवनेश्वरी की खास बात यह है कि यह बहुत ही कम समय मे प्रसन्न हो जाती है परंतु एक बार रुठ गई तो मनाना भी थोडा मुश्किल ही होता है। देवी माँ से कभी भी झुठे वचनो नही कहने चाहिए। इनके जप के लिए स्फटिक की माला का प्रयोग करें और कम से कम ग्यारह या इक्कीस माला का मंत्र जप करें।

मन्त्र – “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः”

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छिन्नमस्ता

यह विद्या बहुत ही तीव्र है। ऐसा मैने कई बार अनुभव किया है। यह देवी शत्रु का तुरंत नाश करने वाली, वाक देने वाली, रोजगार में सफलता, नौकरी पद्दोंन्ति के लिए, कोर्ट के कैस से मुक्ति दिलाने मे सक्षम है और सरकार को आपके पक्ष मे करने वाली, कुंडिली जागरण मे सहायक, पति-पत्नी को तुरंत वश मे करने वाली चमत्कारी देवी है। इसकी साधना सावधान होकर करनी चाहिए क्योकि तीव्र होने के कारण रिजल्ट जल्दी ही मिल जाता है। इसके लिए आप रुद्राक्ष या काले हकीक की माला से कम से कम ग्यारह माला या बीस माला मंत्र जप करना चाहिए

मंत्र- “श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा:”

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त्रिपुर भैरवी
यह देवी प्रेत आत्मा के लिए बहुत ही खतरनाक है, बुरे तंत्रिक प्रयोगो के लिए, सुन्दर पति या पत्नी की प्राप्ति के लिए, प्रेम विवाह, शीघ्र विवाह, प्रेम में सफलता के लिए श्री त्रिपुर भैरवी देवी की साधना करनी चाहिए। इनकी साधना तुरंत प्रभावी है। जिस किसी तांत्रिक समस्या का समाधान नही हो रहा है, यह देवी उस समस्या का यह जड से विनाश करती है। इस देवी का मंत्र जप आप मूंगे की माला से कर सकते है और कम से कम पंद्रह माला मंत्र जप करनी चाहिए।

मंत्र - “ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा:”

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धूमावती

हर प्रकार की द्ररिद्रता के नाश के लिए, तंत्र – मंत्र के लिए, जादू – टोना, बुरी नजर और भूत - प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए, सभी रोगो के लिए, अभय प्रप्ति के लिए, साधना मे रक्षा के लिए, जीवन मे आने वाले हर प्रकार के दुखो को प्रदान करने वाली देवी है इसे अलक्ष्मी भी कहा जाता है तो इसके निवारण के लिए धूमावती देवी की साधना करनी चाहिए मोती की माला या काले हकीक की माल का प्रयोग मंत्र जप में करें और कम से कम नौ माला मंत्र जप करें

मंत्र- “ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:”

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बगलामुखी

वाक शक्ति से तुरंत परिपूर्ण करने वाली, अपने साधक को खाने कि लिए दोडने वाली, शत्रुनाश, कोर्ट कचहरी में विजय, हर प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता के लिए, सरकारी कृपा के लिए माँ बगलामुखी की साधना करें। इस विद्या का उपयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब कोई रास्ता ना बचा हो। हल्दी की माला से कम से कम 8, 16, 21 माला का जप करें। इस विद्या को ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है और यह भगवान विष्णु की संहारक शक्ति है।

मन्त्र – “ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:”

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मातंगी

यह देवी घर ग्रहस्थी मे आने वाले सभी विघ्नो को हरने वाली है, जिसकी शादी ना हो रही, संतान प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति के लिए या किसी भी प्रकार का ग्रहस्थ जीवन की समस्या के दुख हरने के लिए देवी मातंगी की साधना उत्तम है। इनकी कृपा से स्त्रीयो का सहयोग सहज ही मिलने लगता है। चाहे वो स्त्री किसी भी वर्ग की स्त्री क्यो ना हो। इसके लिए आप स्फटिक की माला से मंत्र जप करें और बारह माला कम से कम मंत्र जप करना चहिए।

मंत्र – “ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:”

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कमला

यह देवी धूमावती की ठीक विपरीत है। जब देवी कमला की कृपा नही होगी तब देवी धूमावती तो जमी रहेगी। इसलिए दीपावली पर भी इनका पुजन किया जाता है। इस संसार मे जितनी भी सुन्दर लडकीयाँ है, सुन्दर वस्तु, पुष्प आदि है यह सब इनका ही तो सौन्दर्य है। हर प्रकार की साधना मे रिद्धि सिद्धि दिलाने वाली, अखंड धन धान्य प्राप्ति, ऋण का नाश और महालक्ष्मी जी की कृपा के लिए कमल पर विराजमान देवी की साधना करें। इन्ही साधना करके इन्द्र ने स्वर्ग को आज तक समभाले रखा है। इनकी उपासना के लिए कमलगट्टे की माला से कम से कम दस या इक्कीस माला मंत्र जप करना चाहिए।

मंत्र – “ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:”

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कृपा बिना यंत्र, माला और ज्ञान आदि के बिना किसी भी देवी की उपासना ना करे। जब भी किसी देवी की पुजा करें सदैव यही सोचे कि यह छोटी सी बच्ची या कोई मासूम सा मेहमान मानना चहिए, लेकिन यह बात भी कदापि ना भूले कि यह छोटी से बच्ची अनेको अमोघ शक्ति से युक्त है। जिस प्रकार बच्चे के सेवा करी जाती है उसी प्रकार हर चीज का समय से ध्यान रखे तो 7-10 दिनों मे ही देवी की कृपा अवश्य मिल जाती है और हर कार्य पूर्ण होता है। दस महाविद्या मे कई ऐसी देवीयाँ है जोकि तीसरे दिन ही साधना का परिणाम दे देती है।

Bajrang Baan | बजरंग बाण

चमत्कारी प्रयोग को यहां मैं पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हॅू। एक बात और स्पष्ट कर दॅू कि बाजार में, यहॉ तक कि कल्याण के हनुमान अंक में उपलब्ध बजरंग बाण शुद्ध नहीं है, त्रुटि पूर्ण है। शुद्ध, प्रामाणिक बजरंग बाण मुझे परमपूज्य गुरु जी महाराज सद्श्री अद्वैताचार्य और पूजनीय बुआ जी अनन्त श्री विभूषिता कुमारी अद्वैत कला नमन, अद्वैतागार, बशीरगंज, बहराइच की कृपा से उपलब्ध हुआ है।
अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए मंगल अथवा शनिवार का दिन चुन लें। हनुमान जी का एक चित्र अथवा मूर्ति जप करते समय सामने रख लें। रक्त वर्ण ऊनी अथवा कुशासन बैठने के लिए प्रयोग करें। अनुष्ठान के लिए शुद्ध स्थान तथा शान्त वातावरण आवश्यक है। घर में यदि यह सुलभ न हो तो कहीं एकान्त स्थान अथवा एकान्त में स्थित हनुमान जी के मन्दिर में प्रयोग करें। हनुमान जी के अनुष्ठान अथवा पूजा आदि में दीपदान का विशेष महत्व होता है। इसमें अपने कार्य के अनुरुप अलग-अलग पदाथरें का दिया तथा बत्ती बनाई जाती है। उसी के अनुरुप घी, तेल आदि का प्रयोग किया जाता है। हमारा यहॉ उदद्ेश्य अपनी भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति से है। इसके लिए आप पांच अनाजों (गेहॅू, चावल, मॅूग, उड़द और काले तिल) को अनुष्ठान से पूर्व एक-एक मुट्ठी प्रमाण में लेकर शुद्ध गंगाजल में भिगों दें। अनुष्ठान वाले दिन इन अनाजों को पीसकर उनका दीया बनाऍ। बत्ती के लिए अपनी लम्बाई के बराबर कलावे का एक तार लें अथवा कच्चे एक सूत को लम्बाई के बराबर काटकर लाल रंग में रंग लें। इस धागे को पॉच बार मोड़ लें। इस प्रकार के धागे की बत्ती को सुगन्धित तिल के तेल में डालकर प्रयोग करें। समस्त पूजा काल में यह दिया जलता रहना चाहिए। इसके लिए अपना कोई सहायक रख लें, जो दीये में तेल का ध्यान रखे। हनुमान जी के लिए गूगुल की धूनी की भी व्यवस्था रखें। यह कार्य भी सहायक पर छोड़ दें।
अब शुद्ध उच्चारण से हनुमान जी की छवि पर ध्यान केन्द्रित करके बजरंग बाण का जप प्रारम्भ करिए। श्री राम से लेकर सिद्ध करैं हनुमान तक एक बैठक में ही इसकी एक माला जप करनी हे अर्थात श्री बजरंग बाण के 108 पाठ एक बैठक में पूरे करने हैं। माला फेरने में कठिनाई आती हो तो गूगुल की 108 छोटी-छोटी गोलियॉ पहले से बनाकर रख लें। एक पाठ पूरा होते ही एक गोली हवन में छोड़ दें। इसमें आपको सुविधा रहेगी और गूगुल की सुगन्धि भी वातावरण में व्याप्त रहेगी। जप के प्रारम्भ में यह संकल्प अवश्य ले लें कि आपका कार्य जब भी होगा हनुमान जी के लिए आप नियमित कुछ भी करते रहेंगे। दुर्भाग्यवश आपके कार्य में विलम्ब हो भी जाए तो अविश्वास करके हताश कदापि न हों। कुछ समय बाद एक बार प्रयोग पुनः दोहरा दें। कोई कारण नहीं आपका कार्य सिद्ध न हो।
गूगुल की सुगन्धि देकर जिस घर में बजरंग बाण का नियमित पाठ होता है वहॉ दुर्भाग्य, दारिद्र, भूत-प्रेत का प्रकोप और असाध्य शारीरिक कष्ट आ ही नहीं पाते। समयाभाव में जो व्यक्ति नित्य पाठ करने में असमर्थ हों, उन्हें कम से कम प्रत्येक मंगलवार को यह जप अवश्य करना चाहिए। सांसारिक चिन्ताओं से उत्पन्न हुआ अनिन्द्रा रोग, शारीरिक कष्ट अथवा कोई अन्य संकट, बच्चों की बदनजर, अकारण उपजा भय आदि से मुक्ति पाने के लिए बजरंग बाण का नित्य प्रयोग अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है। सुमंगल, कीर्ति, वैभव अथवा कोई महत्वपूर्ण कार्य अवरोधित हो गया हो तो बजरंग बाण के प्रयोग से शुभ समय पुनः पक्ष में होने लगता है।

बजरंग बाण ध्यानं
श्री राम
अतुलित बलधामं हेम शैलाभदेहं।
दनुज वन कृषानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।।
सकल गुण निधानं वानराणामधीशं।
रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

श्री हनुमते नमः
श्री गुरुदेव भगवान की जय
श्री बजरंग बाण
(दोहा)
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।

(चौपाई)
जय हनुमन्त सन्त-हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलम्ब न कीजे। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु बहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।
बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।
अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दःुख करहु निपाता।।
जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।
ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारु बज्र सम कीलै।।
गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।
सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलंब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि-उर शीसा।।
सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दूत धरु मारु धाई कै।।
जै हनुमंत अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।
वन उपवन जल-थल गृह माही। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पॉय परौं पर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।
जै अंजनी कुमार बलवंता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।
बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।
इन्हहिं मारु, तोहिं शपथ राम की। राखु नाथ मर्याद नाम की।।
जनक सुता पति दास कहाओ। ताकि शपथ विलंब न लाओ।।
जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा।।
शरण शरण परि जोरि मनावौ। यहि अवसर अब केहि गोहरावौ।।
उठु उठु चल तोहि राम दोहाई। पॉय परों कर जोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनंद हमारौ।।
ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।
हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अंत पछतैहौ।।
जनकी लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।
जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।
जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।
जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।
जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति जय त्रिभुवन विख्याता।।
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेशा।।
राम रुप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।
विधि शारदा सहित दिन राति। गावत कपि के गुन बहु भॅाति।।
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।
ऐहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करे लहै सुख ढेरि।।
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत वॉण तुल्य बलवाना।।
मेटत आए दुःख क्षण माहीं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। पर - कृत यंत्र मंत्र नहिं त्रासे।।
भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।
प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प - मृत्युग्रह दोष नसाई।।
आवृत ग्यारह प्रति दिन जापै। ताकि छाह काल नहिं चापै।।
दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।
यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारै।।
शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर कॉपै।।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।
(दोहा)
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान।
तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।